लिखने का मन भी है
पास में कलम भी है
पर मन में अजीब हलचल है
कोई तकलीफ में हो तो
चलती नहीं कलम है
लिखूं तो लिखूं कैसे
उलझन में मन है
कैसे लिखूं मैं कविता दिल से
कलम ही साथ नहीं दे रही मन से
लग रहा आजकल ये भी गमगीन सी है
उदासी में मेरी हंसती हुई कलम भी है
क्योंकि इसकी आंखें नम सी है
लिखूं तो लिखूं कैसे
उलझा हुआ मन है।।
-ममता तिवारी
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