नित-नित आगे बढ़ के दूसरों के जीवन से दुःख हरे,
चलों हम ऎसे दीप बनें, जो दूसरों की राह प्रशस्त करें।
है मन यही, है प्रण यही, कुछ नेक कर्म करें,
हर तरफ जगमग जगमग ज्ञान का दीप जले।
-ममता तिवारी
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