संवेदनाओं के फूल मुरझा गए हैं
इंसानियत जमीन पर आ गई है
केवल शोहरत के सब तलबगार हैं
कैसा बदलता दौड़ आ गया है
अपनापन कही दिखता नहीं
भावनाएं भी चमक खो चुकी हैं
अंधा-धुंध भागते इस दौर में
मानवता सबसे पीछे खड़ी है
जज्बातों की कोई कद्र नहीं
मुस्कान भी सहमी खड़ी है
मानव ही मानव का दुश्मन
ये विकट समस्या गम्भीर खड़ी है
इंसानों की नादानियां देख
ईश्वर भी खौफ में आ गए हैं
जो हवा कल तक खुशबू
बिखेर रही थी आज जहरीली
बन जिंदगी से खेल रही है
धरती-अम्बर सब अचंभित हैं
मानव धुआं-धुआं हो रहा है
मौत ने भी अपना रूप बदल लिया
घटनाएं बनकर आने लगी है।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X