अजनबी हूं मैं ,आज तक अपने दिल की दुनिया में ,
क्या चाहती हूं, ये न समझ सकी इस दुनिया से।
खुद को को भुलाती फिर रही हूं अपनों की खुशियों के लिए,
क्या मिला क्या खोया नही, है शिकायत इस खोखली रिश्तों से।
दर्द के तोहफों को खुद के लिए संभाला अपनो को देकर ,
उनके खुशियों का खुशियों का गुलदस्ता।
कोई न समझ सका अपना मुझे क्या है चाहत मेरी ,
इसलिए बन गई हूं अपने लिए मैं एक अजनबी।
जिसको चाहा वो पास रहकर भी भी अजनबी बना,
कुछ अजनबी दूर रहकर भी मेरे हमदर्द बन गए।
अजनबी हूं मैं अपने दिल के अरमानों से,
कोई न समझे मेरे दिल के दर्द के बौछारों को।
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