किसी का गम,दुख, दर्द तकलीफ देख बेजान,बलहीन बेसुध सी हो जाती हूं
चैन,सुकून,आराम सब गंवा बैठती हूं
दिल-ओ दिमाग जैसे थम से जाते हैं
आत्मा विहीन हो जाती हूं
आंखों के सैलाब रोक नहीं पाती
आंखों से आंसुओं की नदियां
बहने लगती हैं
खुद को संभालूं भी कैसे समझ नहीं पाती
खुद को बहुत विवश पाती हूं
क्या करूं मैं
ऐसी ही हूं।।
-ममता तिवारी
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