रोज़ कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता है,
नई कुछ उम्मीदें विश्वास बो जाता है।
अपनों से आगे निकलने की होड़ में,
आम कुछ रहता नहीं ख़ास खो जाता है।
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