काम ये उसकी ख़ातिर करते चले गए,
जीने की आरज़ू में हम मरते चले गए।
कब,कहाॅ॑,कैसे कुछ पता ही ना चला,
नए मिलें और पुराने ज़ख़्म भरते चले गए।
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