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ऐ वतन

                
                                                         
                            वो जुनून की हद का इश्क हो
                                                                 
                            
वो सुकून की हद का इश्क हो
अगर ये ना हो सके तो फिर माफ कर
किसी और से इस कदर इश्क ना हो ,

तेरी शान के लिए मरूं मैं
तेरी आन के लिए कटूं मैं
जो ना मर सकूं ना कट सकूं
तो किसी और के लिए ना जी सकूं ,

तेरे नाम पे तने हैं सब
तेरे मान पे सने हैं सब
तेरे आकार को साकार दूं
इस माट के जने हैं सब ,

हर एक को तेरी फिक्र हो
हर ज़र्रे में तेरा ज़िक्र हो
हर दिल में तेरी धड़क हो
हर लहू में तेरी फड़क हो ,

तेरे रूतबे को मैं हनक़ दूं
तेरी ज़मी को मैं ख़नक दूं
दिली चाह है बस मेरी यही
एक-एक को मैं ये सनक दूं ,

सबकी सोच में तुझे उतार दूं
सबके जोश से तुझे गुज़ार दूं
जिस सोच में तू ना उतर सके
जिस जोश में तू ना गुज़र सके
उस ऐसे किसी भी एक को
तुझे मां कहने का हक़ ना दूं ।
-ममता सिंह देवा 
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एक वर्ष पहले

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