कभी गैरों से जोड़ देती है अटूट नाता,
कभी अपनों से ही जुदा कर देती है।
क्या शिक़ायत करूॅ॑ तुझसे ऐ ज़िंदगी,
तू है कि हर सीख को ख़ुदा कर देती है।
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