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स्त्री

                
                                                         
                            मैं स्त्री हूँ
                                                                 
                            
मैं नारी हूँ
मैं पुष्पों की क्यारी हूँ
मैं वतन की आम नारी हूँ

मैं दुर्गा हूँ
मैं काली हूँ
मैं गीता हूँ
मैं अपाला हूँ
मैं घोषा हूँ
मैं उर्मी हूँ
मैं कुंती हूँ
मैं गांधारी हूँ
मैं पांचाली हूँ
मैं झांसी वाली रानी हूँ
मैं रज़िया हूँ
मैं मीरा हूँ
मैं राधा श्याम की
मैं ही सीता राम प्यारी हूँ
हाँ!
मैं वतन की आम नारी हूँ

मैं जननी हूँ
मैं बेटी हूँ
मैं बहन हूँ
मैं ही पत्नी हूँ
मैं गृहलक्ष्मी हूँ
मैं ममता हूँ
मैं क्षमता हूँ
मैं सखी
मैं ही सहेली हूँ
और...
तुम कहते हो कि मैं पहेली हूँ!

दु:ख, पीड़ा, वेदना
सब सहती हूँ
लेकिन कुछ न मैं कहती हूँ
दु:खो के कैद में रहूंगी अब ओर कितने दिन
आज़ाद हो जाऊंगी मैं
मेरे भी अधिकार है
अब मुझपर बंदिश लगाना......
कोशिश तुम्हारी ये बेकार है
ना हूँ मैं बंदिनी सुनो
ना हूँ अवलंबिनी सुनो
सृजन की शक्ति है मुझमे
संसार को मैने सजाया है
और....
तुमने मेरे अधिकारों को जलाया है!

मेरा भी ये संसार है
मुझे भी अपनी इच्छा का अधिकार है
तुमने सदैव अपनी इच्छा को मुझपर थोपा है
मेरे पांव में बांध कर बेड़ियां समाज की...
बाहर जाने से रोका है
जब भी मैने कोई सवाल किया
तुमने मेरा हर सवाल बदल डाला
मेरे ऊड़ान भरने से पहले ही...
मेरे पंखों को कतर डाला
मेरी क्षमता को तुमने सदैव...
अपनी सोच के तराजू में तोला है
मैं केवल मौन रहूं!
तुमने यही तो मुझसे बोला है
चार दिवारी ही मेरी सीमा होगी..
तुमने मुझे बताया है
समझ कर कठपुतली तुमने मुझे हमेशा नचाया है

कहते हो लक्ष्मी हूँ
ममता हूँ
शक्ति हूँ
पूजते हो चरण मेरे देवी मुझको मानते हो तुम
और फिर.....
समाज की दकियानूसी सोच के बंधन में मुझे बांधते हो तुम

कभी तुमने जन्म से पूर्व गर्भ में ही...

मुझे मार दिया
कभी धुतकारा
तो...
कभी त्याग दिया
कभी मुझे दाग-दाग किया
तो...
कभी मेरे चरित्र पर ही सवाल किया
और.....
मेरे कुछ कहने से पहले ही....
मुझे समाज के अंधे-बहरे....
कानूनो की जंजीरों में बांध दिया
फिर भी...
स्वयं को मुझसे अधिक आँकते हो तुम
अपनी कायरता को श्रेष्ठ बताकर...
मुझे पर्दे से ढांकते हो तुम!
संपूर्ण संसार की जननी हूँ मैं
और मेरी शक्ति को....
अपने सोच के दायरे से मापते हो तुम!

मैं आज की नारी हूँ
वतन की आम नारी हूँ
ना बेड़ियो में अब बंधूंगी मैं
ना चार दिवारी में अब कैद रहूंगी मैं
अपने अधिकारों की....
अपने सम्मान की...
रक्षा अब स्वयं करूंगी मैं
फैला कर पंख अपने....
स्वछंद आकाश में ऊड़ान भरूंगी मैं
मैं आज की नारी हूँ
किसी बंदिश में अब नही रहूंगी मैं!

-ममता कुमारी
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2 वर्ष पहले

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