आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अधूरी दास्तान

                
                                                         
                            सुनसान है गलियाँ, अब वीराना सा मंजर है,
                                                                 
                            
रानी की यादों में, विजय आज भी बेघर है।

कभी साथ चले थे जो, बस दो चार कदम के थे राही,
आज वक्त ने कर दी है, उनमें एक गहरी दूरी।

रानी की चूड़ियों की खनक, अब कानों में नहीं गूँजती,
विजय की तन्हाई, अब सन्नाटों से ही है पूछती।

क्या वो वादा या सपना कच्चा था, या नसीब का ये खेल है?
जहाँ पहले प्रेम था, वहाँ अब बस यादों का रेल है।
रानी की आँखों में, नमी का एक सैलाब है,
रानी के सवालों का, अब न कोई जवाब है।

विजय की झड़प अब कानों में गूंजती नहीं,
रोज रोज की कलह अब होती नहीं,
रानी के रूह ने भी पूछा ,
अब तो सुकून से सोती हो न??
अब तो रातों को न रोती हो न?

वो बिछड़े कुछ इस तरह, जैसे कोई स्वप्न टूटा हो,
जैसे किसी दरिया से, उसका किनारा छूटा हो।
समय तो बीत रहा है, पर यादें नहीं जातीं,

विजय की वो बातें, आज भी बेचैन कर जाती हैं।
रानीआज भी ढूँढती है, उसे हर भीड़ में कहीं,
विजय दूर होकर भी, बस बसा है उसकी रूह में यहीं।

इश्क की अधूरी ये दास्तान, एक टीस बनकर रह गई,
रानी और विजय की मोहब्बत, वक्त की धूल में खो गई।
मिलाप की आस में, बुझ रही है ये शमा,
किस्मत ने लिख दी है, बस बिछड़ने की दास्तां।

किस्मत का दोष भी कैसे दे रानी,विजय ने खुद भी ,
डाली थी कभी शक की बेड़िया,

इश्क में फ़ना हो जाना अलग बात ,
यू दास्तान कौन लिखता है ,अलग हो जाने के बाद।।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर