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अब और नहीं - ममता कृष्णा

                
                                                         
                            जिन रातों को
                                                                 
                            
जागी ये आँखें,
उन आँखों के वास्ते—
कि छोड़ ना
अब और नहीं,
आखिर कब तक घिसेंगे रास्ते?

नहीं मिल रही ज़मीं तो नहीं सही,
डगमग नइया में ही गुज़ार देंगे साँसें।

जिन बातों में फँसी
दिलो-दिमाग के नसों के धागे—
उन घागो के वाश्ते
कि छोड़ना अब और नहीं,
आखिर कब तक
सुलझाते रहेंगे ,उलझे आहते ?

नहीं मिल रही मुकम्मल जहां तो नहीं सही,
गुमनाम इस नगरी में गुम हैं कई मोहब्बतें।
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3 महीने पहले

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