आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मिला नहीं सुकून

                
                                                         
                            कभी खुद से कभी तकदीर से
                                                                 
                            
मिला नही हमें सुकून जहे नसीब से

आया नहीं खुद पर यकीं कभी
मात देते हमें आये सभी
कहें हम क्या अपनी वफाओं की तस्वीर से
अक्श बंधा सा दिखता है जंजीर से

यूँ तो तोड़ देते शायद हम बंधन सभी
पर अपने से ही जुदा ना हो पाए कभी
ना जाने और क्या होना बाकी है अभी
मुश्किले दौर से ना निकल पाएं हम कभी

राहत -ए-दौर भी आएगा कभी
आस ना तोड़ ए दिल उम्मीद से
खुशी का लम्हा हो के ना हो
मत डुबोना खुद को आँसुओं के सैलाब से

टीस सी उठती है जो सीने में कभी कभी
होता है ये क्योंकि दर्द भी मिला है करीब से

कभी खुद से कभी तकदीर से
मिला नही सुकून हमें ज़हे नसीब से

ममता खुराना
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर