आज मेह से गिरी बूंद ने मेरे तन मन को भिगोया
कुछ बीते लम्हों को याद करके मेरा दिल रोया
बारिश के बादलों की तरह बदला था
किसी ने अपना रंग
पहली बार मैंने देखा था उसका यह ढंग
यादों के झरोखों में जाकर देखती हूं
तो याद आता है
किस तरह से एक ही छतरी के नीचे साथ चले थे हम
आधे भीगे थे तुम आधे भीगे थे हम
प्यार की एक मीठी सी अनुभूति मन में जगी थी
और साथ में एक आस भी मन में उठी थी
बारिश ना रुके काश यह वक्त ठहर जाए
तेरे साथ यूं ही चलते हुए सदियां गुजर जाए
बारिश की मीठी सी सरगम में
हम बहे जा रहे थे
दिल में अनचाहे सपने पले जा रहे थे
ख्वाब से हकीकत में कब तुम
दिल में उतरते चले गए
पता ही ना चला
और हम तुम्हारे आगोश में कब फिसलते चले गए पता ही ना चला
आंख खुली तो तन्हा पाया बारिश में पलकों को हमेशा भीगा पाया
आज भी वो प्यार की बारिश में भीगे
तेरे बदन की खुशबू
मेरी सांसों में महक जाती है
तू नहीं है तेरी यादों को खींच लाती है।
-ममता कनौजिया
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