ऐसा क्या लिखूं जो
लफ़्ज़ों को कविता का रूप दे सकूं
अपने जज्बातों को
मनोभावों के अनुरूप दे सकूं ख़्वाहिशे है कई दिल में दबी
परिंदे बन उड़ान दे सकूं
अपने रंजोगम जो जहां से
बयां कर पाए इस
मोम सी गुड़िया को वह
ज़ुबां दे सकूं
क्या लिखूं जो सवालों को अभिव्यक्त कर सकूं
इस खूबसूरत जहां में
लेखनी को सशक्त कर सकूं।
-ममता कनौजिया
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