जिंदगी के इस सफर में
क्या खोया क्या पाया
इस पर गणना करना
कितना मुश्किल है
सबसे मूल्यवान समय को खोया
जो हर पल हर क्षण बीत रहा
खेल-खेल में आईं जवानी
और बुढ़ापा आवाज दे रहा
कितना बेफिक्र हुआ
करता था वक्त तब,
अब मौत की आहट सुन रहा,
अपनों के खो जाने का ग़म से
वीरानी में जीवन बीत रहा।
जिनको पाया उनसे उलझन
और रूसवाई मिली
महफ़िल पाने की ख्वाहिश में
सिर्फ और सिर्फ तन्हाई मिली।
रूह-रूहानी हो चली है
क्या लिख पायेंगे
ये खोने पाने के झमेले
मसान तक जायेंगे।
जीवन के इस भाग दौड़ में
क्या क्या याद रखेंगे हम
पाप पुण्य हैं पाये कितने
अब उसकी गिनती करना है,
आगे के शुभ कर्म हो अपने
यही प्रभू से विनती करना है।
ममता कनौजिया
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