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प्रतीक्षा में प्रेम

                
                                                         
                            अबके बरस भी सावन बरसा है
                                                                 
                            
फिर से वही शीतल फुहारें
वही बहारें अगन लगाने आयी हैं
तुम तो चले गये मुझे छोड़ कर
कब आओगे बताया भी नहीं
बहुत बार तुम्हारी यादें........
मेरे तन मन को सहला जाती हैं
हर रोज शाम ढले
बहक जाते हैं मेरे कदम
जा कर ठहर जाते हैं
तुम्हारी चौखट पर .........
क्या तुम्हें मेरे पदचाप भी नहीं सुनाई देते?................
आज फिर से गयी थी,
धीरे से किवाड़ खोला......
बहुत सूना पड़ा था तुम्हारा #आँगन
जैसे बरसों से ......
किसी का आगमन न हुआ हो
बहुत अँधेरा था ..........
कुछ जुगनुओं को छोड़ आयी हूँ
तुम्हारे हृदय प्रांगण में,
सुनो.........
बुहार आयी हूँ तुम्हारा आंगन
अपनी पलकों से........
सहेज आयी हूँ हर एक कोना
गमले का वो पौधा भी मुरझा गया था......
जिस पर कभी आयी थी कोपलें
खिले थे नव पुष्प...........
अभिलाषाओं के अंकुर प्रस्फुटित
हो गये थे.........
छोड़ दिया था तुमने बेपरवाह
स्निग्ध पड़ी थी मिट्टी..
अपने स्नेह से सिंचित कर आयी हूँ
इस आशा से.......
कि इस बरस फिर बरसेगा
सावन तुम्हारे आँगन में
फिर आयेंगी नयी कोपलें
फिर से खिलेंगें पुष्प
मेरे एहसासों की खुशबू
फिर से तुम्हारे हृदय को
पल्लवित कर देंगी.......
मुखर हो उठेगा फिर से
तुम्हारा मौन.........
सुनो.........
तुम्हारी चौखट पर
रख आयी हूँ दो पुष्प
हो सके तो उठा कर
लगा लेना ह्रदय से
समझ लूंगी मेरी साधना
सफल हुई...........
तुम्हारी प्रतीक्षा में
समर्पित प्रेम...........
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2 वर्ष पहले

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