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हृदय की पीर

                
                                                         
                            बहुत कुछ है ह्रदय कि गहराइयों में
                                                                 
                            
उड़ेल देना चाहती हूँ सब कुछ
भर देना चाहती हूँ सागर नयन में
पर किसी तूफ़ान के आने की आशंका
फिर कदम पीछे हट जाते हैं
निश्छल सजल नयन
तकते हैं राह उम्मीदों के
और फिर हम टुकड़ों में बंट जाते हैं
पी जाते हैं सागर इन अधरों से
सारे ख़्वाब जब इन
आँखों में सिमट आते हैं
कुछ को खुद दफ़्न करती हूँ
कुछ खुद ही टूट जाते हैं
चलती रहती हूं यूं ही राहों में
रास्ते पीछे छूट जाते हैं
क्या इल्जाम दें हम औरों को
अपना मुकद्दर खुद समझ न पाते हैं
-ममता गुप्ता
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2 वर्ष पहले

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