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ग़ज़ल

                
                                                         
                            महफ़िल से मेरी उठ के जो महमान गया है
                                                                 
                            
घायल वो मिरे कर के दिल-ओ- जान गया है

रक्खा था जिसे हमने निगाहों में छुपा के
अश्कों का वही छोड़ के तूफ़ान गया है

ज़िद्दी है बहुत माने न कहना वो किसी का
अहसान है जो मेरा कहा मान गया है

आमद हुई है आज बहारों की चमन में
आहट से हवाओं की वो पहचान गया है

ऐसे गया है रूठ के सौदाई वो मेरा
जैसे न कभी लौटने की ठान गया है

करने चला था रुसवा सरे बज़्म मुझे वो
अपने किए पे हो के पशेमान गया है

कुछ पल को अता कर के मुझे क़ुर्ब के लम्हे
देकर वो जुदाई का ये ज़िन्दान गया है

मय्यत को मेरी "नाज़" लगायेगा वो काँधा
लिख कर जो अभी मौत का फ़रमान गया है
-ममता गुप्ता "नाज़"
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एक वर्ष पहले

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