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ग़ज़ल

                
                                                         
                            आप जब से मेरी ज़िंदगी से गए
                                                                 
                            
यूँ लगा जैसे हम रौशनी से गए

दिल के अरमां पिघलते रहे रात भर
हिज्र में हम तुम्हारे ख़ुशी से गए

देख कर बेसबब आपकी बेरुख़ी
यूँ लगा जीते जी ज़िन्दगी से गए

रिश्त-ए-इश्क़ क्या तुम ने तोड़ा सनम
आह लब मेरे देखो हँसी से गए

कितने नाज़ों से सौपा था दिल आपको
दिल ये क्यूँ तोड़ कर बेदिली से गए

पीछे पीछे गए फिर भी पाया नहीं
आप आए भी तो किस गली से गए

आतिश-ए-अश्क़ नें यूँ भिगोया की हम
वस्ल के कैफ़ और बेख़ुदी से गए

क़द्रथी कब तुझे मेरे जज़्बात की
बेवफ़ा जा तेरी ज़िंदगी से गए

चाँद चिलमन में शब भर यूँ ढलता रहा
हसरत-ए दीद की हम ख़ुशी से गए

क्या तअज्जुब कि ऐ "नाज़" इस बार भी
यअनी हम सुब्ह तक रौशनी से गए
-ममता गुप्ता नाज़
 
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2 वर्ष पहले

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