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चार की महिमा

                
                                                         
                            आओ प्यारे तुम्हें सुनाएं
                                                                 
                            
चार की महिमा तुम्हें बताएं
चार धर्म अरु वर्ण उचारे
चार दिना ही दीप जलाएँ

मंत्रों में सब लिखीं ऋचाएं
चार वेद हैं चार दिशाएं
चार भाग में बँटता यह युग
चार भाग में लिखी कथाएं

चार चरण जीवन ऋतु काटी
चार जनम की है परिपाटी
अंतिम क्षण की इक अभिलाषा
चार हाथ काँधों की माटी

चार पहर की निद्रा छोटी
चिन्ता में थी तन की रोटी
चार अवस्था काट न पाए
यही सोच के मन घबराए

क्या ऐसे मधुमास छटेगा
जीवन का वनवास कटेगा
चलता ये क्रम युग क्षण प्रतिपल
यहीं फलित हो कर्मों का फल

चार चरण के बाद मिलेगा
दर पे त्रेता खड़ा समय के
द्वापर में रणछोड़ मिलेंगे
काट सको जीवन बिन भय के

धर्म कर्म के पथ पर इक दिन
जागेगा सोता यह कलियुग
लौट वहीं आएगा फिर से
शुभ कर्मों का"चलता सतयुग"
-ममता गुप्ता
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2 वर्ष पहले

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