ज़हन में अटकी हैं कुछ
कविताएँ बरसों से ...
पता नहीं बाहर आने में
क्यूँ हिचकिचाती हैं
शायद अभी दुख दर्द की
स्याही में कुछ और आँसू
घुलने बाकी हैं
या फिर ज़रूरत है
अभी कुछ
रिसते ज़ख्मों को
थोड़ा और कुरेद
खुलकर मुस्कराने की
या फिर सुप्त वेदना को
अश्रु- धारा का छींटा दे
नींद से जगाने की ..
सुना है वेदना जब जब
कलम तराशती है
हृदय के पन्नों पर रच स्वयं को
स्वयं ही निहारती है
फिर कविता का रूप लेकर
पीड़ा को उभारती है
इसलिए तो कहते हैं ...
पीड़ा जब कविता रचती है
सीधी हिय में उतरती है
बन तीर सी जा चुभती है
मग़र जीवन में बहुत बार
पीड़ा ही तो ....
पीड़ा को हरती है
चुन कर कंकड़ राहों के
जा मंज़िल पर पग धरती है l
-:ममता ग्रोवर
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