चाहा था रोकना तुम्हें
जब चल दिए थे रुठ के।
सोचा था मना लूंगी तुम्हें,
आखिर हो तो मेरे अपने ही।
मगर हैरान हूँ अब ये देख के
तुम नाराज़ ना थे,
बल्कि किसी मौके की तलाश में थे ।
दूर गए तो थे उस दिन मुझसे मगर
छोड़ तो बहुत पहले ही गए थे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X