आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

यूँही जाना तेरा

                
                                                         
                            चाहा था रोकना तुम्हें
                                                                 
                            
जब चल दिए थे रुठ के।
सोचा था मना लूंगी तुम्हें,
आखिर हो तो मेरे अपने ही।
मगर हैरान हूँ अब ये देख के
तुम नाराज़ ना थे,
बल्कि किसी मौके की तलाश में थे ।
दूर गए तो थे उस दिन मुझसे मगर
छोड़ तो बहुत पहले ही गए थे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर