मिट्टी के एक लोंदे को, जो मूरत बना देता है,
अंधियारे जीवन में जो, ज्ञान की मूरत सजा देता है।
वो कोई और नहीं, इस धरा पर गुरु का रूप है,
जो कभी ठंडी छांव है, तो कभी कड़कती धूप है।किताबों के पन्नों से आगे, वो जीना सिखाता है,
हार कर भी कैसे उठना है, वो सलीका बताता है।कलम पकड़ना सिखाया जिसने, अक्षर का बोध कराया,
सही-गलत के भेद को, जिसने सहजता से समझाया।राजा हो या रंक यहाँ, सब गुरु के चरणों में झुकते हैं,
ज्ञान की उस अविरल गंगा में, सब अपने संशय धोते हैं।
गुरु नहीं केवल शिक्षक है, वो तो राष्ट्र का भाग्यविधाता है,
उसी के हाथों में देखो, आने वाले कल का ताता है।शीश झुकाएं उस गुरु को,
जिसने हमको इंसान बनाया,भटक रहे थे हम जग में, जिसने हमको मार्ग दिखाया।
शिक्षक दिवस का यह पर्व, आपके चरणों में वंदन लाता है,
आपके दिए संस्कारों से ही, यह जीवन महक-महक जाता है।
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