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मंज़िल की ओर

                
                                                         
                            कुछ किस्मत ही ऐसी मिली थी,
                                                                 
                            
कि चैन से जीने की फुर्सत ही न मिली।
कभी लगता है वक़्त बहुत है हमारे पास,
तो कभी लगता है वक़्त ही नहीं।
बस पहुँचना है उस मंज़िल तक,
जिस मंज़िल के लिए बहुतों ने मुझे कोसा है।
बस उड़ना है उन हवाओं में,
जहाँ सुकून-सा महसूस होता है।
शायद सफ़र आसान न हो,
लेकिन यक़ीन है—
एक दिन यही सफ़र मेरी पहचान बनेगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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