समुद्र भी मथ लिया
रत्न भी आ गये,
स्वर्ग अपना ढूंढ लो
आलोक अपना देख लो।
अमृत के लिये
संघर्ष सर्वत्र व्यापत है,
देवता स्वतंत्र हैं
असुर भी आजाद हैं।
देवलोक अस्थिर है
असुर लोक हिल रहा है,
"त्राहिमाम, त्राहिमाम"
अमृत मिलना शेष है।
महेश रौतेला
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