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जब राजसभा में द्यूत चला था।

                
                                                         
                            कौरवों का प्रतिनिधि दुर्योधन था
                                                                 
                            
पांडव युधिष्ठिर के साथ खड़े थे,
भीष्मपितामह, गुरुजन भी
उसी सभा में बैठे थे।

राजसभा के भीतर झाँका
द्यूतक्रीड़ा के पासे थे,
अनैतिक इस क्रीड़ा के
मूकदर्शक सब महारथी थे।

द्रौपदी तो अग्निगर्भा थी
हवन उसी में होना था,
महाभारत की नींव वही थी
राजा अंधा, पुत्रमोह था।

श्रीकृष्ण तो सूक्ष्म बने थे
विराट अक्ष घूम रहा था,
बुद्धि भ्रष्ट थी,इधर-उधर थी
जब राजसभा में द्यूत चला था।
- महेश रौतेला
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एक घंटा पहले

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