कल रात
रिम-झिम बरसात हुई।
बहुत सी यादें ताज़ा हुई
बहुत से वादे याद आए
किसी की बहुत याद आयी।
नींद आँखों से दूर थी
उतनी ही
जितनी दूर चाँद।
खिड़की के झीने पर्दे से
झाँकता था।
मैंने देखा है
उसे मुस्कुराते हुए
मेरी बेबसी पर।
यदा-कदा,
जब भी वह इधर से गुज़रता है
मुझसे नज़रें मिलाता है
आँखें लड़ाता है।
मैं नज़र चुराता हूँ।
वह,
शातिर खिलाड़ी की तरह
जगह बदल कर
फिर सामने आ जाता है।
चाँद के रूप में
यह
कहीं तुम तो नहीं?
खो गए थे तुम भी तो
इन बादलों में - इस निर्मम चाँद की तरह।
-महेश बजाज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X