आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

निर्मम चाँद

                
                                                         
                            कल रात
                                                                 
                            
रिम-झिम बरसात हुई।

बहुत सी यादें ताज़ा हुई
बहुत से वादे याद आए
किसी की बहुत याद आयी।

नींद आँखों से दूर थी
उतनी ही
जितनी दूर चाँद।

खिड़की के झीने पर्दे से
झाँकता था।

मैंने देखा है
उसे मुस्कुराते हुए
मेरी बेबसी पर।

यदा-कदा,
जब भी वह इधर से गुज़रता है
मुझसे नज़रें मिलाता है
आँखें लड़ाता है।

मैं नज़र चुराता हूँ।
वह,
शातिर खिलाड़ी की तरह
जगह बदल कर
फिर सामने आ जाता है।

चाँद के रूप में
यह
कहीं तुम तो नहीं?
खो गए थे तुम भी तो
इन बादलों में - इस निर्मम चाँद की तरह।
-महेश बजाज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर