मंच था, माइक था, कैमरा था,
बस तहज़ीब कहीं खो गई।
हाथ बढ़ा जब हिजाब की ओर,
तो सत्ता अपनी औक़ात भूल गई।
-अयूब निसार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X