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मैं पंछी बन जाता।

                
                                                         
                            जब आकर पेड़ों पे पंछी,
                                                                 
                            
बैठें फिर चहचहायें।
चहक - चहक कर निज बोली में,
मधुर गीत वो गायें।
तब मेरे मन में आता, मैं पंछी बन चहचहाता।।
जब वे पंखों को फैलाकर,
नभ में उड़ते जाएं।
संग पवन के उड़ते - उड़ते,
दूर देश हो आयें।
तब मेरे मन में आता, मैं पंछी बन उड़ जाता।।
जब वे बागों में पेड़ों पर,
जाकर धूम मचायें।
और रसीले फल डाली से,
कुतर - कुतर कर खायें।
तब मेरे मैं में आता, मैं पंछी बन फल खाता।।
तिनका - तिनका लाकर जब वे,
सुंदर नीड सजायें।
आयें जब पवनों के झोंके,
झूला उन्हें झुलायें।
तब मेरे मन में आता, बन पंछी नीड बनाता।।
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2 घंटे पहले

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