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मगर वहीं कहीं अपनी उम्र बिताई मैंने.

                
                                                         
                            कल जब फिर उस कॉलेज से गुज़रा,
                                                                 
                            
लगा जैसे वक़्त वहीं ठहरा हुआ है...

वही गलियारे, वही सीढ़ियाँ, वही पेड़,
बस उनमें तेरा साथ कहीं बिखरा हुआ है...

हर मोड़ ने तेरा नाम धीरे से पुकारा,
हर रास्ता कोई पुराना सफ़र कह गया...

खुली आँखों से भी कल से यूँ लगता है,
जैसे हर दिन फिर वही दोपहर रह गया...

जहाँ कभी हँसते हुए वक़्त गुज़र जाता था,
आज वहीं ठहरकर ख़ुद से नज़रें चुराईं मैंने...

तू तो शायद बहुत आगे बढ़ गई होगी,
मगर वहीं कहीं अपनी उम्र बिताई मैंने...

अजीब बात है...
यादें कभी लौटकर आती नहीं,
बस एक जगह देखती हैं...
और फिर वहीं रहने लग जाती हैं...

शायद इसलिए...
कल से बंद आँखों में ही नहीं,
खुली आँखों में भी...
मेरा पूरा कॉलेज दोबारा जी रहा है...

 
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2 घंटे पहले

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