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किसी ने उफ़ कहा क्या

                
                                                         
                            किसी ने उफ़ कहा क्या?
                                                                 
                            

स्वेद कण को पोंछती,
स्वयं में ही सिमटती
तंग गलियों से गुजरती
तन को बचती बचाती
स्त्री की चर्चा करूं क्या?

नयन मृग छौने सरीखे
व्याकुल, कोई ओट तकते
भींचते, बरबस बरसते
फिर भी अनवरत सपने
किसी ने उफ़ कहा क्या?

दिवस हो या यामिनी
दामिनी, कामायनी
नेत्र शुष्क कि सजल ह्रद
भाल तिष्ठित स्वेद कण,
कहीं कोई कहकशाँ क्या?

रही सर्वदा यूं ही भाषित
कभी टूटती, कभी लयबद्ध
स्वेद सी कल कल छलक
ढूंढती शीतल वसन
कोई कहे तो क्या?

किसी ने उफ़ कहा क्या?

- लीना झा 

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5 वर्ष पहले

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