सुनो
वो मुझे चिल्ला के कहती है,
अरे तुम चाहते क्या हो
और मैं पूछता हूँ खुद से,
तो कही सारी बातें, आती हैं मेरे जेहन में,
जब भी मिलता हूँ तुम्हें,
तो देख नहीं पाता हूँ तुमको जी भर के
सुनो
मैं चाहता हूँ,
तुम्हें बस देखते रहना,
जब भी मिलती हैं, मेरी आँखें तेरी आँखों से
तेरी नजरें होती हैं मुझ पर ही,
और मैं चुरा लेता हूँ अपनी नजरें
मैं चाहता हूँ,
तेरे साथ पलके नहीं झपकाने वाला खेल खेलना,
मैं चाहता हूँ,
तुम्हारे जाने की बात पर,
वो गीत गुनगुनाना,
जिसे सुनकर महसूस किया है तेरा चले जाना,
मुलाकातें तो होती नहीं वैसे लेकिन
मेरी हाथों की उंगलियाँ भी चाहती हैं,
तेरी उंगलियों के बीच जगह बनाना।
पर हम तो हाथ भी नहीं मिलाते कई बार।
और मेरे दोनों हाथों की उँगलियाँ,
मिल जाती हैं आपस में....
अपनी ख्वाहिश को मारकर मैं लिखता हूँ अपना दर्द,
मैं भी याद रखना चाहता हूँ,
उन यादों को,
जिनमें हम दोनों साथ हो,
जिन्हें सोच कर अकेले में,
मैं चाहता हूँ, बच्चों की तरह खिलखिलाना
लेकिन उन यादों के नाम पे,
बस मैं अकेला ही हूँ,
तू तो कही हैं ही नहीं
एक चाहत मेरी बड़ी ही बदतमीज हैं,
तुम्हें बाँहों में भरने की
तुम्हारे साथ सड़कों पर भटकने की
एक शाम पानी किनारे तेरे साथ बिताने की
मैं चाहता हूँ,
तुम्हें मेरी वो कविताएं सुनाना,
जो मैनें सिर्फ तुम पर लिखी हैं
"मैं तुम्हें रुलाना नहीं चाहता
पर मैं चाहता हूँ,
तू रोए बस मेरे लिए"
वो फिर कहती है,
अरे "कहाँ खो गए"
कुछ जवाब तो दो ?
क्या चाहते हो तुम बोलो?
और मैं अपने ख्वाबों की दुनियाँ से
सच्चाई की दुनियाँ में आ जाता हूँ
और कहता हूँ,
मुझे "तुम चाहिये"
वो हंसते हुए कहती है
"नॉट अवेलेबल..... और कुछ मांगो?
मैं कहता हूँ,
और "कुछ नही''.........!!!
सौरभ मिश्रा
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