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मिलना भी ना मिलना

                
                                                         
                            ये मिलना भी अब मिलने से नहीं होता है,
                                                                 
                            
कुदरत में नहीं भी, यहीं होता है।।

अपनों में भी अपना ही होता है,
वो भी परायों की तरह सोता है।।

घूरतीं है मुझे सपनों की दुनिया,
हकीकत केवल पास बुलाती है,
मेरी नजरों से चांदनी की नींदें चुराती है,
मुझे मेरी लड़ाई निष्क्रिय बनाती है।।

सफर की तन्हाई यही खबर सुनाती है,
मुझे मिलने वालों में ही लड़ाई हो जाती है।।

- ललित दाधीच।।
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2 वर्ष पहले

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