बचपन में तो मैं कुछ
जानता नहीं था,
वर्षा होती थी तो
नंगे बदन निकल जाता था।
हाथ में एक पतली
छड़ी होती थी,
उसे मैं अपनी तलवार
मानता था।
छोटी-छोटी झाड़ियों को
मैं अपना दुश्मन समझता था,
सबकी गर्दनों पर वार करके
अपने को विजयी
मान लेता था।
थोड़ा बड़ा हुआ,
तो कक्षा में मुझे मॉनिटर
बना दिया गया।
यहाँ भी मैं अपने को
विजयी मानने लगा।
कॉलेज में मुझको
NSS का लीडर बना दिया,
आर्मी में भी मुझको
सेक्शन कमांडर बना दिया।
मुझे भी निरंकुश बनने की
लत मानो लगने लगी।
गिरगिट की तरह रंग
मैं भी बदला करता था,
ऊपर से प्रजातांत्रिक बनने का
ढोंग सदा रचा करता था।
मैं भी हिटलर बनना चाहता था,
पर लोगों के सामने
हर हाल में गांधी बनने का
नाटक किया करता था।
समय बदलता गया,
छिहत्तर का हो चला हूँ,
पर निरंकुशता
मेरे ज़ेहन से नहीं उतरी।
अब तो मैं साहित्यिक
परिवेश में उतर गया हूँ।
किसी ने मुझे साहित्यिक
समूह का संचालक बना दिया!
एक बार फिर से
चौथेपन में
निरंकुश बनने का
मौका मुझे मिल गया।
नियमावली के पुलिंदे
सारे सदस्यों के हाथों में
थमा दिए —
“आप लिखते रहें,
हम पढ़ते रहेंगे।
अपने विचारों से
लोगों को तृप्त करते रहें।
कवि-सम्मेलन, वीडियो प्रस्तुति,
गायन हो या वादन —
सब पर मेरा ही अधिकार!
मंत्री कोई भी हो,
उद्घाटन मैं ही करूँगा,
न्यायाधीश भी मैं ही हूँ,
फीता भी मैं ही काटूँगा!
मुझे आए या न आए,
मैं ही दूँगा सबको ज्ञान,
क्योंकि मैं हूँ संचालक
— और यही है मेरा फरमान!”
चलो, अच्छा ही रहा —
निरंकुशता को भी अंतरात्मा से
कभी निकाल न सका।
बचपन से अब तक
साथ रही यह आदत मेरी —
उम्र बढ़ती गई,
मगर हुक्म चलाने का शौक
कभी बूढ़ा न हुआ!
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