मैं ही 'सबका साथ,
सबका विकास' कहता हूँ,
अजीब दास्तान है मेरी।
कहता कुछ और हूँ,
करता कुछ और हूँ,
सोचता हूँ दूसरे सब उल्लू हैं,
दिन के उजाले में
मैं उन्हें चूना लगा सकता हूँ।
विनम्र मैं हूँ नहीं,
पर लोगों को विनम्रता का
उपदेश मैं देता हूँ।
शिष्टता से कोसों दूर हूँ मैं,
फिर भी लोगों को शिष्टता का
पाठ मैं पढ़ाता हूँ।
मेरे उपदेशों में विद्वत्ता टपकती है,
लोगों को उपदेश देता हूँ,
पर इन बातों को
खुद समझने में मैं ही
सबसे पीछे रह जाता हूँ।
मन में मेरे यही है -
मुझे एक बार यह स्टेज मिल जाये,
फिर लोगों को अपना जलवा दिखलाऊँगा,
बेसुरा मैं जन्म से हूँ,
फिर भी गर्दभ-राग सबको सुनाऊँगा।
मैं भी कहूँगा -
सबका साथ, सबका विकास,
इसी को तो कहते हैं।
मैं आपको हिदायत दूँगा -
मेरी कविता, मेरे लेख, मेरे संस्मरण आप पढ़ें,
और प्रतिक्रिया देना न भूलें,
इससे आपका विकास होगा।
सच तो यह है,
मुझे तो सिर्फ हितोपदेश देना आता है,
आस्था चैनल का गुरु हूँ मैं,
मेरा प्रवचन आप सुनते रहें,
और मेरी जय-जयकार करते रहें!
-.लक्ष्मण झा ‘परिमल’
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