कहानी नहीं,
वास्तविकता थी ,
जो मुझे सोचने पर,
मजबूर कर गई कि-
आदमी जो सभ्य होने का
ढोंग रचता है,
आदि मानव से भी
बदतर है,
जो नंगा रहता था ,
कच्चा मांस खाता था,
और जंगलों में रहता था ,
आज आदमी - आदमी का दुश्मन है।
वो नंगा नहीं रहता,
मगर दूसरों को नंगा
करने कि भावना रखता है ।
वोह कच्चा मांस नहीं खाता,
पर दूसरों का खून ,
पीने को उतावला है ।
वो जंगल में नहीं रहता ,
मगर बसते गाँव शहरों में ,
दहशत फैला कर ,
जंगल बना देना चाहता है ।
आख़िर क्यूँ ?
चंद चांदी के टुकडों के लिए ,
या उस झूठी शान के लिए
जो पानी के बुलबुले के समान है ,
धर्म, जाति, समाज कि दुहाई देकर ,
सभ्य मानव सभ्यता का
गला घोंट रहा हैं ।
कुसुम गुप्ता, पंचकुला
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