आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सभ्य मानव

                
                                                         
                            कहानी नहीं,
                                                                 
                            
वास्तविकता थी ,
जो मुझे सोचने पर,
मजबूर कर गई कि-
आदमी जो सभ्य होने का
ढोंग रचता है,
आदि मानव से भी
बदतर है,
जो नंगा रहता था ,
कच्चा मांस खाता था,
और जंगलों में रहता था ,
आज आदमी - आदमी का दुश्मन है।
वो नंगा नहीं रहता,
मगर दूसरों को नंगा
करने कि भावना रखता है ।
वोह कच्चा मांस नहीं खाता,
पर दूसरों का खून ,
पीने को उतावला है ।
वो जंगल में नहीं रहता ,
मगर बसते गाँव शहरों में ,
दहशत फैला कर ,
जंगल बना देना चाहता है ।
आख़िर क्यूँ ?
चंद चांदी के टुकडों के लिए ,
या उस झूठी शान के लिए
जो पानी के बुलबुले के समान है ,
धर्म, जाति, समाज कि दुहाई देकर ,
सभ्य मानव सभ्यता का
गला घोंट रहा हैं ।

कुसुम गुप्ता, पंचकुला

-हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर