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सपने

                
                                                         
                            सपनो की भी एक अपनी दुनिया है
                                                                 
                            
अलग अलग तरह के सपने
अजीबो गरीब सपनें
रोज हमें खिंच ले जाते हैं ।

कभी सोते हुए,
कभी जगते हुए ।
कभी रोते हुए तो
कभी हँसते हुए ।।

कभी दिन में भी,
कभी घनी अंधेरी रातों में ।
कभी यूँ ही बेमतलब कि तो
कभी मन के गहरे जज्बातों में ।।

कभी अपनों के बीच,
कभी कभी अनजानों में ।
कभी आस पास की गलियों में तो
कभी दूर खेत खलिहानों में ।।

कभी बचपन की मीठे यादों में ,
कभी जवानी के झूठे किस्सों में।
कभी परिवारिक हर्ष उल्लासों में तो
कभी जीवन के संघर्षों वाले हिस्सों में ।।

कभी सुगम सुनहरी मंजिल पर,
कभी भूली भटकी राहों में।
कभी फंस जाते है गैरों में तो
कभी अपने प्री त की बाहों में ।।

कभी मान मनौव्ल चलता है ,
कभी अपनों से लड़ जाते हैं।।
कभी  भिड़ जाते हैं सीमा पर तो
कभी घर में ही डर जाते हैं।।

हाँ पर इन सब की आपा धापी में
चप्पल अक्सर घर पर ही रह जाता है।
फिर बज उठता है अलार्म सुबह का
और सपनों की बाते सपने में रह जाती है ।।



- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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