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मन गगन है अनमनू

                
                                                         
                            है हवाओं में खलिश जब
                                                                 
                            
मन गगन है अनमना
धूप की घटती तपिश से
तन बदन है कुनमुना।

मौन सुबह है, सुबह से
मौन दिन और दोपहर
रात की खामोशियों में
मौन मन का हर सफर
लब पे है हलचल नहीं पर
बहती मन की वेदना
है हवाओं में खलिश जब
मन गगन है अनमना।

हो गया कैसा सफ़र ये
जिसमें ना कोई शोर है
हर कदम पर है उदासी
रंगों का ना दौर है
खिलखिलाए कोई कैसे
जब मरे संवेदना
है हवाओं में खलिश जब
मन ..................... अनमना।

कैसी ये नियति बनी कि
मन पे ढाती नित कहर
पीड़ा अपनों से मिले जब
तर्क अपने बेअसर
आस फिर कैसे जगाएं
छाया है कोहरा घना
है हवाओं में... ....... अनमना।

साथ रहकर भी है दूरी
शून्य सा एहसास है
है भला क्यों ये निरवता
पास बस संत्रास है
खो गईं बातें सभी जब
मौन मध्य अपने तना
है हवाओं में खलिश ......अनमना।

लड़ रहें हैं रोज सच से
झूठ का जीवन लिए
जीतना मुश्किल है लेकिन
जीतने की जिद लिए
मौन का मकरंद पी कर
मन भ्रमर का मन बना
है हवाओं में तपिश..... अनमना-2।
-श्वेता कुमारी
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एक घंटा पहले

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