मंदिर मस्जिद करता रहा बन पाया न कोई,
ना तू ही पूरा रहा ,ना आधा रह पाया कोई और,
मन्दिर मस्जिद तोड़ा फिर भी अमन-खुशी ना आयी,
जो घर बनाये बिगड़े का कोई खुशहाली ही खुशहाली होय,
राम-रहीम दिन-रात रटे फिर भी चैन ना होय ,
भूखे को भोजन कराएं प्यासे को पानी पिलाये ,
फिर बेचैनी काहे को होय
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे।
कमेंट
कमेंट X