आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ये धरती हिंदुस्तान की

                
                                                         
                            जाति-धर्म मे बंट नही सकती,
                                                                 
                            
दुश्मनों से झुक नही सकती,
ये भूमि है स्वाभिमान की,
ये धरती हिंदुस्तान की।।

लहरों से अड सकती है,
तूफानों से भिड सकती है,
ये मिट्टी है बलिदान की,
ये धरती हिंदुस्तान की।।

सबको ये अपना माने,
सबके मन की ये जाने,
ये जननी है सम्मान की,
ये धरती हिंदुस्तान की।।

सनातन धर्म की पालक यही,
मानवता की अराधक यही,
ये तपस्थली 'श्रीराम' की,
ये धरती हिंदुस्तान की।।

सब धर्मों को मान दिया,
संस्कृतियों को सम्मान दिया,
ये जननी विश्व महान की,
ये धरती हिंदुस्तान की।।

कुलदीप ठाकुर
मथुरा(उ.प्र)


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर