कल की उम्मीद में,
सुबह से शाम तक
प्रतिदिन नया- नया,
इतिहास लिख रहा हूं।
आशा की किरणों में,
बंधा एक परिंदा हूं,
थककर हारकर,
रोज चल रहा हूं।
जितने लोग मिलते हैं,
उनसे मिले अनुभव को,
मौन से साझाकर,
सुमिरन कर रहा हूं।
किसने दिया किसने लिया,
यह भी धूमिल हो रहा है,
दर्दनाक हादसों को,
याद कर रहा हूं।
प्रतिदिन नया- नया,
इतिहास लिख रहा हूं।।
-कुलदीप शुक्ला
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