बस जिंदा हूं मरा नहीं,
ना रोने को आंसू हैं,
ना हंसने की वजह,
शरीर में दम नहीं,
मन किसी से कम नहीं।
शान्ति की चाहत में,
अध्यात्म में उलझ गया,
अनगिनत विचारों से,
लड़ता चला गया।
समस्या का समाधान,
ढूंढने में लगा दिया,
जीवन का अधिकांश भाग,
फिर भी अव्यवस्था का,
बनता रहा शिकार।
बनता रहा शिकार।।
-कुलदीप शुक्ला
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