घनघोर घटाएं बरस पड़ती हैं तुझे देख कर,
अगन है की जो बुझ न पाई इस पानी से.
ख्वाइशे अक्सर जाग उठती हैं अंगड़ाई को,
अजीब दस्तूर है इस निगोडी बरसात का.
दूर बहुत दूर घटाएं नजर आ रही थी गगन में,
मैने छाता क्या खोला जम के बरसने लगी.
जहां मैं जाती हूं वहीं चले आते हैं ये बादल,
लगता है दीवाने हो गए है ये बादल.
सौंधी महक बढ़ा देती है प्यास प्यार की,
लगता है पानी नहीं प्यार की प्यास बरस रही है बूंदों की शक्ल में.
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