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प्रशस्त हो प्रशस्त

                
                                                         
                            स्वकर्म में ही व्यस्त हो,किंचित कोई न त्रस्त हो।
                                                                 
                            
शौर्य स्वाभिमान का, दिनकर कभी न अस्त हो।
हां हर कोई निज देश की ही उन्नति में मस्त हो,
प्रशस्त हो प्रशस्त,हिन्दवासियों प्रशस्त हो।।

सीमा पे तुम जवान हो,खेतों में तुम किसान हो।
हो सैन्य शक्ति भी तुम्ही,नेता तुम्ही महान हो।
हो पंथ में बटे बदन,किंतु सबकी जान एक है।
विभिन्न संस्कृति सना,हिंदुस्तान एक है।
यहां प्रेम भरता हर प्रहर, हर आदमी में गस्त हो।
प्रशस्त हो प्रशस्त,हिन्दवासियों प्रशस्त हो।।

मानस पढ़ो श्री राम की,गीता पढ़ो घनश्याम की।
गुरुग्रंथ साहिबे पढ़ो,व कुरान इस्लाम की।
न जाति धर्म में लड़ो,एकात्मक आगे बढ़ो।
नवकाल नवनिहाल कर,उन्नति की सीढ़ियां चढ़ो।
जो कर रहीं मतभेद हैं,वो जालिकाएं ध्वस्त हों।
प्रशस्त हो प्रशस्त हिन्दवासियों प्रशस्त हों।।

सोंचो जरा इस देश की,सोंचो जरा परिवेश की।
हमको फसाने में लगी हैं,नीतियां विदेश की।
पहले लड़ाए अब वही,शासन हैं करते पाक में।
और चाहते हैं हिंद की,अखंडता को खाक में।
न धर्म जाति में बटें,न एकता का अस्त हो।
प्रशस्त हो प्रशस्त,हिंदूवादियों प्रशस्त हो।।

वो चाहते हर मुल्क में,निज पक्ष की सरकार हो।
ना हो पक्ष में बनी,तो सल्तनत पे वार हो।
ये नीतियां है लंका और बांग्ला सिमट गईं।
धर्म और जाति करके सल्तनत पलट गईं।
कृष्णा भारत की एकता,बनी जीवन परस्त हो,
प्रशस्त हो प्रशस्त,हिंदूवादियों प्रशस्त हो।।
-कृष्णा प्रभाकर अवस्थी 
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एक वर्ष पहले

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