चकोरियां खोजती है शशि,
नदिया सागर को,
और चकोर सहते है पीड़ा,
और पर्वत अपार दुख को।
मगर कोई इन पवनो से पूछो,
पूछो जलती किरणों से,
क्या तलाशते है,
क्यो नित-दिन धरती पर झांकते है ये।
क्या मनु की ही भांति
इनमे भी है संवेदना?
फिर खोजते,ढूंढते,तलाशते
क्यो उत्पन्न होती नहीं वेदना?
ये मानव तो निज स्वार्थ से
प्रेम के मधुर गीत गाता है,
जो जागे कभी परमार्थ
कवि-हृदय मुग्ध हो जाता है।
मगर,मानव के खोज की भी
भावनाए अति प्रगाढ़ है,
जैसे सपनो के प्रीती युक्त घर की,
शीशों से बनी हर एक दीवार है।
करु जो इस मन की कल्पना
जल युक्त मेघ के समान है
टकराते ही पर्वतों से,
वर्षा वेग अपार है।
होना था इसे भी,
साहसी सूर्य-चंद्र सा,
खोजता नित-प्रतिदिन मगर,
कम होती नहीं दिव्यता।
बिखरता भले ही प्रवर्ष की बूंदों सा,
मगर बन चमकता कनक नाहि धतूरा।
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