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एक दफ़ा फिर उस शहर में

                
                                                         
                            एक दफ़ा फिर गई थी मैं, उस शहर में
                                                                 
                            
जहाँ बचपन मेरा बीता था।
एक गली मिली मुझे अनजानी सी।
एक सहेली खड़ी थी कुछ पहचानी सी।
एक मकान था कुछ पुराना सा।
एक आंगन था अब वीराना सा।
एक छत थी कुछ ऊँची सी।
एक सीढ़ी थी कुछ टूटी सी।
एक बक्सा था यादों से भरा।
एक पेड़ उग रहा था वहां हरा- हरा।
कुछ सामान था वहां ,जो मुझे उठाना था।
कुछ यादें थी ,जिन्हें चुराना था।
एक फोटो थी ,जिसे फ्रेम करना था।
एक चश्मा था ,जिसे जुड़वाना था।
एक मेडल था ,जो कभी सबको दिखाना था।
सब छोड़ आईं वहीं ,सिवाए एक डायरी के,
लिखा था उसमें कुछ ,जो तुम्हे पढ़ाना था।
एक वक़्त गुजरा सा।
एक हिस्सा पूरा सा।
एक उमर कच्ची सी।
एक नीयत सच्ची सी।
एक लड़की प्यारी सी।
एक ख्वाहिश अधूरी सी।

- कोमल शर्मा, अध्यापिका
लखनऊ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

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