कहने को तो वह अपना सा था
आंखों में बसा एक सपना सा था
कहना तो बहुत कुछ था तुमसे,
बात लफ़्ज़ों पर आ ना सका,
बस हमको इतना ही गम था,
लफ्जों से बयां करना था
दिल की बात को अदा करना था
पर ऐसा हो न सका शायद ,
वह जुबा पर आने से डरता था,
कहने को तो वह बना सा था
कुछ कहते कहते थम सा गया था,
लगता वह कुछ रिश्तो का अहसास सा था,
फिर धड़कन से आवाज आई,
कहीं मैं गलत कुछ कर तो नहीं रहा था ,
बस फर्क इतना ही था !
लगाने को वह अपना लगा,
आंखों से बातें बया ना हुआ ,
डरते हुए कुछ बोले शायद
पर दिल की कह न सका,
यू कहे तो वह अपना सपना सा था;
एक पल की याद में महसूस दिलाया जो था,
हर क्षण कहने को जैसे वह तड़पता सा था
पर वह बातें होठों पर ला ना सके,
ऐसा लगा कि वह किसी और से डरता था,
कहने को तो वह अपना सा था;
कहने को तो वह अपना सा था ,
बयां ना कर सके मा नो सपना सपना सा था,
आपस के रिश्तो को समझ ना सके हम
दूसरों की खुशियों को बचाना हमारे किस्मत में था;
कहने को तो बहुत कुछ था
दूसरों की खुशियों से दबा सा था,
काश महसूस किया होता वह भी
की वहीं तू मेरा अपना सा था;
कहने को तो वह अपना सा था
हर क्षण लगता सपना सा था
छोड़ गए वह हमें इस दौर में,
जब आंख खुली देखा फिर लगा
यह एक सपना ही था;
-Shivyanshi
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