आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चांद से रिश्ता

                
                                                         
                            हम भी चांद से क्या क्या रिश्ते बना बैठे है
                                                                 
                            
छोटे थे बचपन में हमारा मामा था चांद
बड़े हुए महबूब चाहिए चांद जैसी
शादी हुई तो मां को बहू चाहिए चांद जैसी
हुई पैदा किलकारी घर में बेटी चाहिए चांद जैसी
जिम्मेदारी आई कंधों पर सीरत चाहिए चांद जैसी
तमाचा मारा वक्त ने तो बुढ़ापा चाहिए चांद जैसा
आई मौत सामने तो "खुशी" चाहिए चांद जैसी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर