प्रत्यूष स्पर्श
नभ निखर उठा
उदित सूर्य
ऊषा की लाली
आशा से भरी हुई
विजेता मन
नव दिवस
सुनहरा प्रभात
कलरव है
पूर्ण स्वप्न है
मगन गगन भी
नयन तृप्त
नभ को देखा
प्रभाकर उदित
कामना पूर्ण
मधुप गूंजे
रात्रि बीत चुकी है
जीवन चक्र ।
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